
श्री. कलंकी अवतार ईश्वर वैजनाथ भगवान के पूर्वजो का
– अल्प परिचय –
परम पूजनीय श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान के पूर्वज मूल रूप से हैदराबाद शहर के रहने वाले थे। तेलुगू उनके घर मे पिढीजात भाषा थी| इसी तरह, मराठी भाषा भी वे अच्छी तरह से बोल-समझ सकते थे। वे भोसले परिवार से थे! शिंदे उनके माता के घराने का नाम था। उनकी पिछली चार-पांच पिढीयो के संबंध के बारे मे जादा जानकारी नही। सिर्फ यह समझ में आता है की पुणे मे पेशवा के समय पर उनकी माँ की परदादी को पालकी से लाते ले-जाते थे। उनके पास कई दास, दासी और नौकर-चाकर थे। इससे यह प्रतीत होता है की वैजनाथ भगवान के पूर्वजों का संबंध राज परिवार से था। शहाजी राजे भोसले(छत्रपती शिवाजी महाराज भोसले के पिता) निज़ाम के यहा कार्यान्वित थे ना! तेलुगू भाषा में उनका एक बड़ा चरित्र उपलब्ध है। इसी तरह, वैजनाथ भगवान के परिवार के कुछ संबंध भोसले घराने से होने चाहिए।
वैजनाथ भगवान के दादा स्व. सखाराम पंत वर्धेकर भोसले धुले शहर में गोंधले गली में रहते थे। बाद मे वहा से वे नासिक चले गए। तभी हाल ही में, मोटर-कारों का एस्तेमाल करना शुरू हुआ था। वैजनाथ भगवान की दादी ने पहली बार मोटर-कार देखी और सोचा की “यह क्या भाग रहा है?”। उसे देख उन्हे बडा आश्चर्य हुआ और उन्हें डर भी लगा। डर के मारे वे घर मे ही बैठी रही। अन्य लोगों ने मात्र मोटर-कार पर हल्दी-कुमकुम लगाया। भगवान के पिता स्व. लक्ष्मण सखाराम वर्धेकर भोसले इन्हे एक भाई था। उनका नाम स्व. नरसिंगजी सखाराम वर्धेकर भोसले था।
जैसा की ऊपर उल्लेख किया गया है की उनकी माँ शिंदे घराने से थी। इसी घराने में से वैजनाथ भगवान के दादा (माँ के पिता) स्व. भवानी बापूजी शिंदे यह संगमनेर शहर के साळीवाडा क्षेत्र में रहते थे। वे एक महान विठ्ठल भक्त थे। अपनी भक्ती के कारण वे बडे जाने जाते थे। परिस्थिती कारणवश बाद में वे नासिक चले गए। उन्हे दो बेटियाँ थीं। अंबा उर्फ अनुसया (वैजनाथ भगवान की माँ) और भागुबाई (वैजनाथ भगवान की मौसी)। लक्ष्मणराव और नरसिंगराव को नासिक मे बरतंन व्यापार और किराने की दुकान मे काम करते देख भवानी बापू ने अपने आपसी संबंधो को ध्यान मे रखते हुए अपनी दोनो बेटीयो का ब्याह इन दोनो भाइयों से करा दिया और इस तरह यह दोनो बहने एक दुसरे की देवरानी-जेठानी बन गई।
भगवान के पिता स्व. लक्ष्मणराव यह इस युग के साक्षात अत्रिमुनि ऋषी थे और उनकी पत्नी अंबा यह साक्षात माता अनुसया थी। इसी तरह चाचा नरसिंगजी यह इस युग के संत सावता माली थे और उनकी पत्नी भागुबाई यह संत जनाबाई थी। इस तरह इन सारे दिव्य शक्तियो का पुनर्जन्म हुआ था। क्योंकि आने वाले समय मे उनके परिवार में सर्व शक्तिमान, त्रिकालदर्शी, त्रैलोक्यनायक, विश्वमंभर परमात्मा सगुण रूप मे वैजनाथ नाम से जन्म लेने वाले थे।
वैजनाथ भगवान के चाचा-चाची नरसिंगराव और भागुबाई को ९ बेटे और ७ बेटियों हुई। लेकिन दुर्भाग्य ऐसा की उनमें से एक भी शिशु जिया नही। तब दत्त भगवान ने भागुबाई(संत जनाबाई) से कहा, “देखा आपने प्रपंच कैसा मजेदार होता है।” वैजनाथ भगवान के घराने मे उनके माता-पिता की दत्त भगवान संग साक्षात रूप से मुलाकात होती थी। दत्त भगवान का उनके यहा गुप्त रूप से सोच-विचार, रहना, खाना पिना होता। यह सब अद्भुत घटनाए आगे क्रमवंश आएगी ही।
नासिक में रहते समय की एक घटी हुई घटना! वैजनाथ भगवान की माँ अंबा यह साक्षात माता अनुसया का रूप होने के कारण एक साधु महाराज ने उन्हे पहचान लिया। तब उन्होने वैजनाथ भगवान की माँ के पिता से कहा की, आपकी पुत्री को गोदावरी नदी मे स्नान करने के बाद काला-राम मंदिर में औदुंबर के पेड़ को परिक्रमा करने कहे। तदनुसार, वैजनाथ भगवान की माँ ने नियमित रूप से औदुंबर के पेड़ की परिक्रमा करना शुरू किया। सन १९१३ की घटना! एक दिन परिक्रमा के समय, दत्त भगवान एक वृद्ध तपस्वी के रूप मे वही पास के बारामदे मे बैठे थे। उन्होंने अंबा उर्फ अनुसया माँ से कहा, “हे कन्या! अपने उस दत्त भगवान से कहो की, इस बुढे को थंड ना लगने दे।” यह सुनकर माँ हैरान हो गई और बोली, “महाराज! आप क्या कह रहे हो?” तब दत्त भगवान ने माँ को पास बुलाया और पूछा, “हे कन्या! तुम्हें क्या होता है?” तब माँ ने कहा, “मेरे शरीर पर साप गिरते हैं। डर लगता है।” तब दत्त भगवान ने कहा की, “मुझे पहचाना क्या? मैं मनुष्य के रूप में साक्षात दत्त तुमसे मिलने आया हूँ। तुम्हारे कमंडल में पानी है क्या?” माँ ने “हा” कहा। बाद मे माँ ने कमंडल दत्त भगवान के हात मे दिया। दत्त भगवान ने मंत्र कहकर वह कमंडल माँ को वापस दिया। उन्होने वह तीर्थ माँ को पीने के लिए कहा। माँ ने उस तीर्थ को दत्त भगवान के सामने ही पिया। तब दत्त भगवान ने कहा की, “आपके गर्भ से कलंकी अवतार का जन्म होगा।” ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गये। फिर माँ घर लौट आई और यह सब घटना सबको बताई, तब सभी को बडा आश्चर्य हुआ। बाद मे 3 साल तक गर्भ माँ के पेट में घुम रहा था। फिर बुखार आना-जाना शुरु हुआ। उस समय, वैजनाथ भगवान के माता-पिता संगमनेर मे सालीवाडा क्षेत्र मे श्री. गणपतसिंग सरदारसिंग परदेसी इनके घर में रहते थे। यह लगभग १९१५ का समय था।
संगमनेर में माँ शनी मंदिर के सामने के दत्त मंदिर में नियमित रूप से परिक्रमा करती थीं। उस समय मनोहरजी दत्त मंदिर में पुजारी थे। उन्होंने माँ से गुरु चरित्र सुनने के लिए कहा। और फिर तभी से माँ के पेट मे गर्भ का तेजी से बढ़ना शुरु हुआ। बाद में एक दिन माँ जब घर में जमीन पर सोई हुई थी तभी नाग की छाया गर्भपर गिरी और तीसरे दिन मतलब श्रावण शु. १! १ ९ १६ सोमवार के दिन सूर्योदय के समय ६:०० बजे वैजनाथ नामक साक्षात जगदात्मा, विश्वचालक शक्ती लोककल्याणार्थ सगुण रुप मे धरतीपर अवतीर्ण हुए। वैजनाथ भगवान का जन्म पूर्व साक्षात्कार होकार आयोनी संभवही हुआ था। वैजनाथ भगवान के जन्म के एक महीने बाद सारा परिवार नासिक में पंचवटी में रहेने आया। पंचवटी में उनका 3 स्थानो पर निवास हुआ। पहला शनी भगवान मंदिर के पास मारवाड़ी के यहा, दुसरा सीताबाई सोनार के घर में और फिर तीसरा काला राम मंदिर के पिछे बापू छत्रे इनके हवेली में।
कलंकी वैजनाथ भगवान का बचपन नासिक -पंचवटी में गुजरा। उनकी पढाई चौथी कक्षा तक हुई। दस वर्ष की आयु मे स्कूल मे श्री. दगडू अप्पाजी निऱ्हाळी उनके गुरुजी थे। वैजनाथ भगवान की बाईं आंख के नीचे एक सफेद बाल बडा हो रहा था। यह देखकर, निऱ्हाळी गुरुजी ने वैजनाथ भगवान की माँ से कहा, “यह लड़का कोई तो सत्पुरुष बनेगा।” क्योंकि इस तरह का सफेद बाल संत पुरुषो के बिना किसी को नही आता। बाद मे निऱ्हाळी गुरुजी ने वैजनाथ भगवान से कहा, “बेटा!” आगे बडे होकर क्या आप हमें पहचानोगे?” वैजनाथ भगवान ने मुस्कुराकर “हाँ” कहा। १५ वर्ष की आयु होणे तक वैजनाथ भगवान माता-पिता के साथ नासिक-पंचवटी मे ही रहे। वैजनाथ भगवान की आयु के आठवें वर्ष की एक घटना! नासिक-पंचवटी के काला राम मंदिर मे माँ की परिक्रमा नित्य रुप से जारी थी। एक दिन वही पास के मारुति मंदिर के पंडाल मे साईबाबा एक युवक के रुप मे, बढे नाखुन, बढे बाल, दाढी बढी हुई, तेजस्वी शरीर ऐसी अवस्था मे आसन पर बैठे हुए थे। उन्हे देखने लोगों की भीड़ जमा थी। उनके सामने बहुत सारी मिठाई रखी हुई थी। पर वे उसे खा नही रहे थे। फिर माँ ने उनसे कहा, “खाना खाने घर चले महाराज!” वे माँ के साथ खाना खाने घर आए। बाद में नियमित रुप से वे माँ के साथ खाना खाने आया करते थे। ऐसा छह महीने तक चल रहा था। रहते मात्र वे काला राम मंदिर में ही थे।
एक दिन भोजन के बाद, साईनाथ पास खडे होकर बच्चों को खेलते हुए देख रहे थे। वैजनाथ और अन्य बच्चे खेलते खेलते उनके पास आ पहुचे। साईनाथ ने अन्य बच्चों को भगा दिया मात्र वैजनाथ भगवान को अपनी गोद में लेकरं उनके मुह पर से हात फेरा और कहा, “बेटा! घबराओ मत! मैं साईबाबा हू! दत्त महाराज ने मुझे भेजा है! राम अवतार मे हम वसिष्ठ थे! ज्ञानेश्वर के समय हम कबीर थे! अब हम साईनाथ है! बडे होने के बाद एक दिन आपसे मिलने दत्त भगवान आयेंगे और आपको अनुग्रह देकर जायेंगे! तुम माँ को जाकर कह दो!” बाद में वैजनाथ भगवान घर लौट आए। माँ को उन्होने सारी घटना बताई। उसी समय, साईनाथ भी वहा आए और माँ को सारी सच्चाई बताई और फिर वे सबके सामने अदृश्य हो गए।
इसके बाद दत्त भगवान दो बार मिलके गए। एक बार तो एक संन्यासी के रुप में भिक्षा मांगने के लिए वे वैजनाथ भगवान के घर आए। जब अन्य लोग भिक्षा दे रहे थे तब दत्त भगवान ने भिक्षा नहीं ली। मात्र वैजनाथ भगवान से उन्होने भिक्षा ली। वैजनाथ भगवान और उनकी माँ को देखकर दत्त भगवान को बडा आनंद हुआ। बाद में, अन्य लोग संन्यासी (दत्त भगवान) को बुरा-भला कहने लगे की, “आप हमारी पवित्र भिक्षा ना लेते हुए एक मराठा जाती के बालक से भिक्षा ले रहे हो! ऐसा कोई संन्यासी कैसे कर सकता है?” किंतु उनकी बातो पर ध्यान दिए बिना दत्त भगवान ने वह भिक्षा लेकर नासिक मे गोदावरी नदी के पास के एक बड़े मंदिर में उसे खाया और फिर अदृश्य हो गए।
नासिक-पंचवटी में काला राम मंदिर के औदुंबर के पेड को माँ की परिक्रमा के नित्यक्रम के दौरान एक विष्णु स्वामी नाम के संन्यासी दर्शन के लिए आते थे। वे जन्म से ही अंधे थे। शिष्य उन्हें दर्शन के लिए ले आते। वे माँ को “जय अनुसया माता!” कहकर नमस्कार करते। माँ को साक्षात दत्त भगवान के दर्शन होते है इस बात की उन्हे जानकारी थी। भिक्षा मे भी वे माँ को काफी सहायता करते। वही काला राम मंदिर मे द्वारकबाई नाम की एक विधवा थी। वह बडी गुरु भक्त थी। वह अनुसया माँ को बहुत मानती थी। वर्ष में दो बार, वह माँ को पूरण पोली का प्रसाद देती और कहती “यह माता अत्री अनुसया को अर्पण कर रही हू!” साथ मे उन्हे बडी दक्षिणा भी देती थी।
काकड़ा आरती के लिए काला राम मंदिर में भजन मंडल की काफी महिलाएं इकट्ठा होती थीं। वे सारी माँ को काफी मानती थी। वे जानती थी की माँ को दत्त भगवान की भेट हुई है। बबई मानकर, अक्का मानकर और मुकुंदबुवा तेली और उनके परिवार का माँ से काफी लगाव था। बाद में, सन १९३१ में वैजनाथ भगवान की छोटी बहन शांताबाई का १३ वर्ष की आयु मे निधन हो गया। वैजनाथ भगवान तब १५ वर्ष के थे। इससे पहले भगवान के मौसेरे भाई श्री. गजानन दुध की मातोश्री यल्लूबाई का नासिक-पंचवटी मे निधन हुआ था।
बाद में, वैजनाथ भगवान माता-पिता के साथ नासिक मे ही शुक्रवार पेठ मे गवली गली मे रहने चले गए। वहा पहले से ही माँ के भाई भीमसिंग वर्ड और बहन जाणकाबाई रहते थे। माँ के दुसरे भाई अण्णासाहेब सदाशिव पेठ मे रहते थे। वहा रविवार पेठ मे सोमनाथ मंदिर मे अनेक देवताओ के छोटे-छोटे मंदिर थे। वैजनाथ भगवान माँ के साथ वहा परिक्रमा करते थे। उसी दौरान से वैजनाथ भगवान को भाव-समाधी लगना शुरु हुआ था। उस कारणवश उन्हे तकलीफ होना भी शुरु हुआ था। अन्न खाया नहीं जा रहा था। वे देहभान अवस्था मे नही थे। उस मंदिर में शंकरराव ब्राह्मण पुजारी थे। दत्त भगवान पर उनकी बडी श्रद्धा थी। वे पहले रेल्वे मे स्टेशन मास्टर थे। उनके परिवार के सभी लोगो का स्वर्गवास हो चुका था। इसलिए, उनमे शुद्ध बैराग निर्माण हो चुका था। वे गुरुचरित्र के ७:७ पारायण करते थे। उनकी भगवान दत्त के प्रति बड़ी श्रद्धा, भक्ति थी।
ऐसा चल रहा था उसी दौरान एक दिन दत्त भगवान एक युवा जटाधारी ब्राह्मण के रूप में शंकरराव पुजारी के घर आए। उन्होने किसी को भी अपनी पहचान होने नहीं दी। वैजनाथ भगवान और माँ की परिक्रमा का नित्यक्रम चल ही रहा था। उस समय दत्त महाराज ने गुप्त रूप से वैजनाथ भगवान और माँ से कहा की “मैं आया हूं। पुजारी और अन्य किसी को यह बात मत बताना।” बाद में दत्त भगवान ने खुद गुरुचरित्र का पठण किया। समाप्ती के दिन माँ ने बडी पूजा का आयोजन किया और स्वयं दत्त भगवान के लिए पुरणपोली का खाना बनाया। बाकी सभी ने भी बडी भक्ती भाव से खाने का आनंद लिया। उस दिन शंकरराव पुजारी भी वही थे। स्वयं दत्त भगवान द्वारा बनाए गए प्रसाद का उन्हे दिव्य लाभ मिला। बाद में कुछ दिन रहकर वैजनाथ भगवान और माँ से अनुमती लेकर दत्त भगवान अदृश्य होकर चले गए। शंकरराव पुजारी को “जा रहा हू” बस इतना ही कहा। जाने के बाद, उन्होंने शंकरराव पुजारी को दृष्टांत दिया। “अरे ! मेरी पूजा क्यू करते हो! महार के भगवान की पूजा करो। तुमने मुझे पहचाना नही।” जब इस दृष्टात की बात पुजारी ने माँ से कही, तब माँ ने उनसे से कहा की, “साक्षात् दत्त भगवान आए थे। आप उन्हें पहचान नहीं पाए।” यह सुनकर शंकरराव पुजारी दुखी होकर रोने लगे और कहने लगे “मैं बहुत पापी हूं! मै दत्त भगवान को पहचान नहीं पाया।”
पुणे मे शुक्रवार पेठ – गवली गली मे वैजनाथ भगवान व्यायाम करने के लिए उस्ताद शिवराम दादा के अखाडे मे जाते थे। और भी कई बच्चे उस समय वैजनाथ भगवान के साथ वहा आया करते थे। बचपन में उनकी झोली मे दत्त भगवान और बजरंगबली की छोटी मूर्तिया होती थी। एक दिन विठोबा चौधरी नाम के एक बच्चे ने पूछा “वैजनाथ! ये थैले मे क्या हैं?” वैजनाथ भगवान ने कहा, “दत्त भगवान और बजरंगबली की छोटी मूर्तियाँ हैं।” तब अनजाने में विठोबा चौधरी ने कुछ बुरा कहकर उनका उपहास किया। थोडी देर बाद सारे बच्चे अखाडे से बाहर आए। बाद में यही विठोबा चौधरी जब अपने घर के तबेले मे गया, तभी अचानक एक सांड छूट गया और उसने विठोबा के हाथ के पंजे मे सिंग घुसा दिया। इस चमत्कार को देखकर, बाकी बच्चों ने कहा, “वैजनाथ एक दिव्य अवतार है।” और तब से, बाकी सारे बच्चे वैजनाथ भगवान से डरकर रहते और उन्हे परेशान नहीं करते।
बाद में सोमनाथ मंदिर के कुछ कर्मठ लोगो द्वारा परेशान करणे के कारणवश वैजनाथ भगवान गवली गली से शुक्रवार पेठ मे गाडीखाना यहा बाळोबा वंजारी इनके घर रहने चले गए। पुणे शहर मे बुधुवार पेठ इलाके मे दगडू हलवाईजी इनके दत्त मंदिर मे माँ की परिक्रमाओ का नित्यक्रम शुरु हो गया था। संगमनेर के बापूराव जोशी उस मंदिर मे पुजारी थे। उन्होंने वैजनाथ भगवान की माँ को पहचान लिया और कहा, “आप भवानी बापू शिंदे की बेटी हो ना?”
यहा वैजनाथ भगवान बॅ. खाजगीवाले इनके रामेश्वर के मंदिर में औदुंबर पेड के नीचे दत्त पादुकाओं की परिक्रमा करते थे। माँ पुणे में तुलसीबाग इलाके मे आता जाती रहती थीं। एक दिन, वैजनाथ भगवान औदुंबर पेड़ की परिक्रमा कर रहे थे। वही पास मे दत्त भगवान लंबी कफनी पहने हुए, जटाधारी, पास मे झोली ऐसी अवस्था मे लेटे हुए थे। जैसे ही उन्होंने वैजनाथ भगवान को देखा, वह ऊठकर बैठे गए और उनकी आँखों से आसू आने लगे। और फिर वे खुद से कहने लगे, “ॐकार स्वरूपा! हमें जिस शक्ती की तलाश थी वह मिल गई।” थोडी देर बाद वैजनाथ भगवान ने रामेश्वर मंदिर में ही बजरंगबली की परिक्रमा करना शुरु कर दिया। दत्त भगवान वहा भी आकर बैठं गए। उन्होने ताली बजाकर वैजनाथ भगवान को पास बुलाय और कहा “मैं पत्थर में नहीं हूं। माँ को जाकर कहो की हम आए है। मैंने जो तीर्थ दिया था वो याद है ना?” तब वैजनाथ भगवान घर लौट आए और माँ को सारी बात बता दी। फिर माँ ने कहा, “वह साक्षात् दत्त भगवान है बेटा।” फिर माँ जल्दी से मंदिर में आई। दत्त भगवान ने उनसे पूछा, “मुझे पेहेचाना क्या? मैने दिये हुए तीर्थ की याद है क्या?” माँ ने “हा” कहा। “आपकी सेवा चल रही है।“ दत्त भगवान ने माँ से कहा,”मैं बच्चे का(वैजनाथ भगवान का) भविष्य बताने के लिए आया हूँ।” फिर माँ ने घर जाकर दत्त भगवान के लिए भोजन बनाया। थोडी देर बाद, वैजनाथ भगवान मंदिर में उन्हे ले जाने आए। फिर वे दोनो बाते करते-करते घर की ओर बढने लगे। घर लौटते समय रास्ते में एक दुकान में एक गृहस्थ बैठा था। वह ईश्वर को गंदी गंदी गालियां देकर कोस रहा था। और कह रहा था की, “भगवान की माँ … …। भगवान ने मेरे लिए कुछ भी अच्छा नही किया?” दत्त भगवान ने वैजनाथ भगवान की ओर देखा और कहा, ‘हम तो निर्गुण निराकार हैं! यह हमें और हमारी माँ को गाली दे रहा है। हमारे मूल मे माता-पिता ही कहा है? मरने दो इन्हे।” ऐसी ही बाते करते-करते दत्त भगवान अचानक से अद्र्युश्य हो गये। वैजनाथ भगवान डर गए और घर चले आये। देखा तो दत्त भगवान घर पर थे। वैजनाथ भगवान बहुत चकित हुए। इसके बाद दत्त भगवान, वैजनाथ भगवान, उनकी माँ और पिता सभी ने एक साथ भोजन किया। भोजन समाप्ती के बाद माँ ने दत्त भगवान से कहा की मेरी बहन जानकाबाई को बेटा नहीं है। आपकी कृपा से उसे पुत्र लाभ हो और आप उसे दर्शन दे। दत्त भगवान ने पहले “नहीं” कहा। और माँ से पूछा की, “पिछले जन्म मे वे कौन थी?” माँ ने कुछ भी जवाब नहीं दिया। फिर उन्होने माँ से कहा, “अपनी बहन जानकाबाई को यहा ले आओ।” तदनुसार, जानकाबाई दत्त भगवान के सामने आईं। बाद में, दत्त भगवान ने कलंकी वैजनाथ भगवान के हाथो से नारियल उनकी झोली में डाला और कहा, “पहले लड़की होगी और फिर बेटा होगा।” तदनुसार कुछ सालो बाद, जानकाबाई को मंदा और भोलानाथ ऐसे दो बच्चे हुए। ये बच्चे वैजनाथ भगवान के यहा कार्यक्रम में आया करते थे। थोडी देर बाद दत्त भगवान ने वैजनाथ भगवान का भविष्य बताना शुरू किया और कहा, “विभूति कहाँ काम करती है क्या? विभूति का जन्म तो धर्म कार्य के लिए होता है। वैजनाथ भगवान के मुख से छह शास्त्र, अठारह अध्याय और चार वेदों का सार निकलेगा। यह सभी तरह का अध्यात्मिक लेखन होगा और वह पूरी दुनिया में प्रसिद्ध होगा।” दत्त भगवान हर दिन घर आते, खाना खाते और शाम को अद्र्युश्य होकर चले जाते। ऐसे तीन सप्ताह तक शुरू था। इस दौरान, एक दिन जब दत्त भगवान सो रहे थे वैजनाथ भगवान उनके पैर दबा रहे थे। वही पड़ोस मे घी बेचने वाले लोग रहते थे। वैजनाथ भगवान को पैर दबाते देख उन्हे न जाने किस बात पे हसी आ रही थी। वह देख दत्त भगवान ने पूछा, “वैजनाथ! आप उदास क्यू हो?” तब वैजनाथ भगवान ने कहा की, “ये घी बेचणेवाले लोग आपको देखकर हस रहे है।” फिर दत्त भगवान ने कहा की, “शाम तक क्या होता है आप देखो।” बाद मे वो घी अचानक से बदबुदार, खराब स्थिती मे कुछ ग्राहको को बेचा हुआ पाया गया। वह देख लोगो ने घी बेचने वालो की जमकर पिटाई की। फिर वो उसी अवस्था मे घर लौट आए। फिर दत्त भगवान ने वैजनाथ भगवान से कहा, “देखा आपने ये घी वाले कैसे रो रहे है।“ मेरी अगाध माया किसी को नही समझ सकती। दत्त भगवान हमेशा कहते थे।, “मेरा लिखा हुआ किल्ला कभीं नहीं टूट सकता है!”
तीन सप्ताह बाद विजयादशमी दशहरा का अवसर देखकर शाम को त्रैमूर्ति दत्त भगवान ने माता-पिता के समक्ष कलंकी वैजनाथ भगवान के सर पर हाथ रखकर उन्हे अनुग्रहित किया। उस समय वैजनाथ भगवान के मस्तिक्ष मे ज्योत चली गईं। यह माता-पिता ने स्वयंम अपनी आँखो से देखा। उस वक्त दत्त भगवान एकमुखी, लंबी कफणी(साधुओं के पहनने का बिना सिला हुआ ढीला-ढाला कुरता) पहेन हुए और बहुत दिव्य शरीर ऐसे तेजस्वी दिख रहे थे।
अनुग्रह के बाद भोजन करते समय, दत्त भगवान ने वैजनाथ भगवान को पैर के नाखूनों से सर के बालो तक गौर से देखा और कहा, “अब मेरा काम हो गया है।” त्रैमूर्ति दत्त भगवान की भविष्यवाणी के अनुसार आगे चलकर सारी घटनाए होने ही वाली थी। उस समय, माता-पिता ने दत्त भगवान से पूछा, “क्या हम अमर होंगे?” दत्त भगवान ने कहा, “जग रीतीनुसार आपकी मृत्यू निश्चित है!” वैजनाथ भगवान को मात्र उनकी पद्धती अनुसार ही अदृश्य कर ले जायेंगे!” दो-तीन दिन बाद त्रैमूर्ति दत्त भगवान वापस जाने के लिए निकले और जाते समय उन्होने वैजनाथ भगवान को, “चिरंजीवि हो” ऐसा आशीर्वाद दिया। यह घटना सन १९३६ में हुई थी।
दत्त भगवान ने माता-पिता से कहा, “दुनिया में कई संत विभूती होकर गए और आज भी हैं परंतु उनमे पूर्ण परब्रह्म अवतार, परमात्मा विभूति एक ही होती है। बाकी सारे संत-विभूति अंशात्मे यह भी मेरे ही है। शिर्डी के साईंबाबा, शेगाँव के गजानन महाराज, नगर के मेहरबाबा, साकुरी के उपासनीबाबा, सातारा नजीक कृष्णधाम के कृष्ण महाराज गोगटे, रामदासी पुरुष, पूर्ण प्रज्ञ बाबाजान, संत गाडगेबाबा, अक्कलकोट स्वामी, वज्रेश्वरी के नित्यानंद महाराज, केडगाव के नारायण महाराज, संत गंगागीर बाबा इ. अनेक मेरे ही अंशात्मे है। अभी मैंने पूर्ण परब्रह्म कलंकी अवतार रूप धारण किया है।
इससे पेहेल भी एक बार दत्त भगवान वैजनाथ भगवान से मिलने आए थे और सबके सामने अद्र्युश्य होकर चले गए थे। उन्होंने वैजनाथ भगवान को अपना सर्वस्व रूप दिखाया था। सबसे पहले, उन्होंने आधा इंच लंबे बालो के धागे जितना रूप दिखाया फिर धीरे धीरे अपना आकार बडा करते-करते लगभग छः फिट लंबा बना दिया। और वैजनाथ भगवान से कहा “आगे चलकर आपको भी यही स्थिति प्राप्त होगी।” इसके अलावा, “अपना कार्य पूरा करें, बाहर निकलें। आपको आगे बहुत कार्य करना हैं।” ऐसा भी कहा। इसी तरह, माता-पिता को देखकर उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता की मृत्यु वाई गाँव मे हुई थी। मैं प्रति दिन उनकी समाधि स्थल पर जाता हूं।” इसका मतलब यह है की, अहंब्रह्मास्मि इस रिश्ते से, कलंकी भगवान के माता-पिता और मेरे माता-पिता एक ही हैं। और वैजनाथ और मैं एक ही हूं। इसके अलावा यह भी बताया की, “इस युग में आपका हमारा रिश्ता बदल गया है। अभी साक्षात परब्रह्म(वैजनाथ भगवान) आपके पुत्र बन गए हैं।”
बाद में, धर्म कार्य की खातिर स्वयंम कलंकी वैजनाथ भगवान, माता-पिता और चाचा-चाची यह पांच विभूतीया पुणे से बाहर निकले। पुणे में रहते हुए, चाचा और पिता की रोज ब्राम्हणो के यहा भिक्षा शुरु थी। वे भिक्षा लाते और उसी पर यह पांच विभूति गुजारा करते। पुणे से बाहर यात्रा मे भी भिक्षा शुरु थी। रोजाना १०:१२ मील की यात्रा होती थी। यात्रा करते-करते वे सारे भोर गाँव में आए। भोर में उन्होने बजरंगबली के मंदिर मे सात दिनो तक निवास किया। वहा से निकलकर आगे वे मांढरदेवी काळुबाई के पर्वत पर आए। वहा दो दिन रहकर वहा से वे वाई गए और वहा कृष्णा नदी के नजीक रास्तेजी इनके हरेश्वर के मंदिर मे रहने लगे।
यात्रा पर निकलने से पहले दत्त भगवान ने कहा था की, “रास्ते में आपको सिद्ध(संत) पुरुषों की मुलकात होगी।” तदनुसार, हरेश्वर के मंदिर मे माता-पिता सिद्ध पुरुषो के बारे में सोच ही रहे थे की वही दो-तीन दिन बाद एक युवा नौजवान, हाथो मे चिमटा और झोली लिए हुए, कान फटे हुए, कानो मे कुंडल, शरीर पर कफनी पहने हुए ऐसे रूप मे गोरखनाथ महाराज वहा आए। मंदिर की तरफ इशारा करते हुए उन्होने वैजनाथ भगवान की माँ से पूछा, “यह क्या है?” माँ ने जवाब दिया, “यह भगवान हरेश्वर का मंदिर है।” तब गोरखनाथ महाराज ने कहा, “यह तो पत्थर है! हम भगवान है?” बाद मे उन्होने वैजनाथ भगवान के चाचा से कहा की, “कलंकी वैजनाथ भगवान को बुलाकर लाओ”। उस समय वैजनाथ भगवान कृष्णा नदी के पूल के पास बैठे थे। चाचा उन्हे भगवान गोरखनाथ के पास ले आए। बाद में, गोरखनाथ महाराज ने वैजनाथ भगवान को जोर से गले लगा लिया। और माँ से कहा, “आपको दत्त भगवान ने कहा था ना की, “सिद्ध पुरुषों से मुलकात होगी। मै गोरखनाथ हू।” उस दिन, माँ का मंगलवार का व्रत था। गोरखनाथ ने कहा, “माताजी! आज आपका मंगलवार का उपवास है ना?” बाद मे उन्होने अपने पास की खाली झोली पलट दी तो क्या आश्चर्य हुआ! उसमें से काफी मात्रा मे मूंगफली और अरहर की दाल निकली। गोरखनाथ महाराज ने कहा, “माताजी पकाव।”
फिर माँ ने खाना बनाया। उस समय, गोरखनाथ महाराज और कलंकी वैजनाथ भगवान ने साथ मे एक ही थाली में भोजन किया। जाते समय गोरखनाथ महाराज ने कहा, “माताजी, बारह साल बाद, आप इस स्थान पर वापस आएंगे!” और कलंकी वैजनाथ भगवान से कहा, “दवा खाते जाओ!” इसका मतलब यह था की, आगे चलके वैजनाथ भगवान पर जहर का प्रयोग होगा। शरीर कमजोर गिर जाएगा। उससे बचने के लिए आपको दवा खाने की आवश्यकता होगी। उसके बाद गोरखनाथ महाराज सबके सामने अद्र्युश्य हो गए और जाते जाते कहा, “तुम चलो! हम तुम्हारे साथ हैं!”
कुछ दिनो बाद वैजनाथ भगवान सातारा आए। वहां उनकी मुन्सीजी हवालदार के साथ पहचान हुई। उनके वहाँ पाँच-सात दिनों तक रहने के बाद वैजनाथ भगवान उंब्रज चाफल गए। चाफल गाँव मे वे रामदास स्वामीजी के मठ मे गए। चाफल मे रामी रामदास(रामदास स्वामी के भाई) और स्वामी रामदास इनके दो अलग-अलग मठ हैं। उस समय बापूसाहेबजी रामदास स्वामीजी की गद्दी पर थे। वहां के लोगों ने उनका बडा अच्छी तरह से खयाल रखा था। बापूसाहेब प्रभुती ने वैजनाथ भगवान के माँ से पूछा, “इस सज्जनगड पर यह युवा लड़का (वैजनाथ भगवान) हमेशा के लिए रहे तो कोई आपत्ती है क्या?” तब माँ ने कहा यह एक स्वतंत्र अवतार कार्य है। हम किसी भी गद्दी पर नहीं रह सकते। प्रस्थान के दिन, मठ के अधिकारियोने उन पांच विभूतियो को उचिष्ट भोजन दिया और दक्षिणा दी और उनसे हमपर हमेशा कृपा बनाये रखे ऐसी बिनती की।
आगे वैजनाथ भगवान कऱ्हाड गाँव गए। वहा कृष्णा और कोयना नदी के संगम पर स्नान कर वे कोल्हापुर की ओर चल पड़े। वहा जाते समय वैजनाथ भगवान के पास कुछ भी नही था। वे माता-पिता और चाचा-चाची के साथ महालक्ष्मी मंदिर गए। वहा मंदिर मे माँ ने माता महालक्ष्मी से कहा, “लक्ष्मीबाई! हमारे दत्त महाराज को जल्द मिलने को कहें, अन्यथा देखें!” फिर वे सारे वहा से निकल पडे। पास मे सिर्फ दो आणे(पुराणे जमाने की मुद्रा) थे। उसमें से छह पैसे से थोडा चावल और बेसन का आटा लिया। कोल्हापुर से चार मील दूर एक जगह एक किसान से उसके तबेले मे रहेने के लिए जगह मांगी। किसान ने रहने के लिए जगह उपलब्ध कराई। बाद में, माँ ने वहा चावल और बेसन बनाया। उसी समय, दत्त भगवान एक बुढे के रूप मे सर पर पट्टी बांधे हुए, एक हाथ मे दंडा और दुसरे हाथ मे छाता लिए हुए जंगले मे से भागकर आए। तबेले मे वह किसान भैंस का दूध निकाल रहा था। दत्त भगवान ने उनके पास दूध मांगा। उन्होंने किसान से कहा, “अरे, यहा जंगले मे क्यू रह रहे हो? कोल्हापुर मे जाओ।” तभी माँ ने उन्हें पहचान लिया। बाद में दत्त भगवान सबके पास आए और सभी के मुंह पर से हाथ फेरा और कहा, “आप सब बहुत थक गए हैं!” बाद मे उन्होने सब के साथ भोजन किया। उन्होने अपने थाली मे का प्रसाद सभी को दिया। उस समय, आसमान में बिलकुल भी बादल नहीं थे। बाद में उन्होने अपनी माया से बादल निर्माण कर खूब बारिश बरसाई। तब वो किसान तबेले से चला गया। दत्त भगवान ने सभी के उपर छाता पकडा और कहा, “केडगाँव के नारायण महाराज बंगलौर में अपनी अंतिम सास लेने वाले है। आप आपकी पदयात्रा जारी रखें। गाणगापुर जाए। हम साथ मे हैं ही!” ऐसा कहकर सुबह वे अदृश्य होकर चले गए।
मिरज गाँव से पंढरपुर जाने के लिए एक रास्ता है। वैजनाथ भगवान अपने माता-पिता और चाचा-चाची के साथ चार-पाँच दिनों तक वहा रहे। आगे सोलापुर, अक्कलकोट होते हुए गाणगापूर आए। गाणगापूर में भीमा-अमरजा संगम देख के वहा सात दिनों तक रहकर वापस अक्कलकोट लौट आए। वहां वे स्वामीजी के मठ में आए।
वहा पर अक्कलकोट स्वामीजी का स्वर्गवास हुआ था। मठ में रहते समय सावित्रीबाई खोत अपनी बेटी वत्सलाबाई के साथ स्वामीजी के दर्शन के लिए आयी थी। उन्होंने माता-पिता और वैजनाथ भगवान का दिव्य रूप देखकर पूछा, “आप कौन हो? आप कहाँ से आए हैं?” तब माता-पिता ने कहा, “ये अवतार हैं। इनके उपर भगवान दत्त की कृपा है।” उस समय सावित्रीबाई ने कहा, “आप हमारे गाँव बेलगाव आओ, हम वैजनाथ भगवान की देखभाल करेंगे। माता-पिता ने कहा, “यह दत्त भगवान का अवतार कार्य है। हम नहीं आ पाएँगे।” उस दौरान वैजनाथ भगवान के ग्रंथो के लिखने के कार्य ने जोर पकड़ना शुरू किया था।
बाद मे अक्कलकोट से वह सब सोलापुर आए। वहा ढोंडिबा शिम्पीजी के यहा कुछ दिनों तक रहने के बाद वे पंढरपुर आए। और फिर वहा से मिरज-सांगली के रास्ते सांगली आ पहुंचे। सांगली मे ब्रह्मनाल में आनंदमूर्ति महाराज की समाधी देखकर वे औदूंबर में आए। वहां सात दिन रहने के बाद वे सातारा के लिए निकले। उनकी सारी यात्रा पैदल ही थीं। वहां वापस वे सब शेख मुंशी हवलदारजी इनके यहा ठहर गए। मुस्लिम होने के बावजुद उन्होंने वैजनाथ भगवान से अनुग्रह लिया था और मुंबई से भगवान दत्त की एक बड़ी सी तस्वीर लाकर वैजनाथ भगवान को समर्पित की थी। वह तस्वीर आज भी कलंकी वैजनाथ भगवान आश्रम में दिखाई देती है।
वैजनाथ भगवान की चाची जनाबाई गाँव में भिक्षा मांगने जाया करती थी। एक दिन भिक्षा मांगते-मांगते वे सब पुलिस इंस्पेक्टर श्री. सदाशिव गोविंदराव गायकवाड़ इनके घर अचानक जा पहुची। उनकी माँ ने जनाबाई को भिक्षा दी और उनके बारे मे पूछताछ की। तब जनाबाई ने बताया की, “हम पाँच जन हैं। हमारा बेटा अवतारी पुरुष है। उनको भगवान दत्त ने अनुग्रह दिया हुआ है।” यह सुनकर, गायकवाड़ इन्स्पेक्टर की माँ ने कहा, “हमें अपने बेटे के दर्शन के लिए ले जाओ।” बाद में एक दिन गायकवाड़ इन्स्पेक्टर की माँ और उनकी बहु वैजनाथ भगवान के दर्शन के लिए आए। वह साथ मे पेढा और हार लाए थे। शेख मुंशी हवलदार का बिडीका एक छोटा सा कारखाना था। कलंकी वैजनाथ भगवान वही बैठे थे। यहीं पर दोनों महिलाएं दर्शन करने पहुच गई। कुछ पुलिसवाले भी वहां बैठे थे। उन्होने इन्स्पेक्टर की माँ को पहचान लिया। उस समय एक बड़ा चमत्कार हुआ। इन्स्पेक्टर की माँ को वैजनाथ भगवान के पास भगवान दत्त और बजरंगबली खडे नजर आए। वह जोर से चिल्ला पडी, “साक्षात भगवान दत्त और बजरंगबली वैजनाथ भगवान के पास खड़े हैं।” यह सुनकर पुलिस हैरान रह गई और बोली, “माताजी! हमे वह दिखाई नही दे रहे।” माताजी ने जवाब दिया, “आपकी अभी तक दिव्य दृष्टी नहीं हुई है।” बाद मे कुछ दिनों तक वे नियमित रूप से दर्शन के लिए आने लगी।
एक दिन उन्होने कहा की, “मेरी बेटी मंगलवार पेठ में रहती है। वही पर वैजनाथ भगवान के रहने की व्यवस्था करते है।” फिर वहाँ जाने का फैसला हुआ। प्रस्थान के दिन, गायकवाड़ इन्स्पेक्टर के यहां भोजन का कार्यक्रम हुआ। वही पर उनके बेटे को वैजनाथ भगवान ने अनुग्रह दिया। यह लड़का अपनी माँ की आज्ञा मे रहता है।
वैजनाथ भगवान विठ्ठलदास गोकुलदास गुजर सातारा इनके यहा मंगलवार पेठ मे काला-राम मंदिर के पीछे बगीचे में रहते थे। वहा चार कमरे थे। सभी प्रकार की सुविधाएं थीं। वहा वैजनाथ भगवान की चाची रोजाना भिक्षा मांगने जाती थी। पिताजी और चाचा ब्राह्मणों के पास भिक्षा मांगने जाते थे। सातारा में भारी प्रसिद्धी के कारण कई लोग वैजनाथ भगवान के दर्शन के लिए आने लगे थे। कई लोगों को अच्छे-बुरे अनुभव हुए। वैजनाथ भगवान की संध्या आरती के लिए कई भक्त एकत्र हुआ करते थे।
सातारा में कुछ अज्ञानी और कर्मठ लोगों द्वारा वैजनाथ भगवान को काफी तकलीफ हुई। इन दुष्ट लोगों द्वारा वैजनाथ भगवान पर चार बार विष प्रयोग भी हुआ। विश्वनाथ जंगम यह भिक्षा मांगकर गुजारा करनेवाला लिंगायत स्वामी! वह साप पकडा करता था। वह वैजनाथ भगवान के पास हमेशा आया करता था। लेकिन उसकी भावना दुष्ट थीं। एक दिन उसने एक बडे साँप को पकडा और उसे वैजनाथ भगवान के कमरे में छोड़ दिया। वैजनाथ भगवान उस समय सो रहे थे। जंगम ने शंख बजाया और कहा, “आपकी और हमारी यह आखरी मुलाकात!” और वह निकल गया। वैजनाथ भगवान जब सुबह निंद से जागे तो देखा वह साप पीछे की दीवार पर खडी लकडी की तरह रातभर चिपका हुआ था! वह साप नीचे आया ही नहीं था। बाद मे घर मालिक के पुत्र ने उस साप को पकड़कर मार दिया। उस साप से वैजनाथ भगवान को किसी भी तरह की कोई हानी नही हुई थी। यह एक बड़ा आश्चर्य था। बाद में एक दिन ऐसी घटना हुई, जब विश्वनाथ जंगम साँप पकड़ने गया था, तो उसके हाथ पर एक साँप ने काट लिया। उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया। पंद्रह-बीस इंजेक्शन दिए गए। हाथ बहुत सूज गया था। बड़े प्रयास से विश्वनाथ जंगम की जान बचाई गई थी। उसे अपने किए कर्म का पछतावा हुआ और कहने लगा, “मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मुझे क्षमा करें।”
उपर जिस गायकवाड इन्स्पेक्टर का उल्लेख किया गया है उनका तबादला होने के बाद वे सातारा आए। वहा वे कोरेगांव में राधाबाई जिजाबा बर्गे इनके यहा रह रहे थे। उनके द्वारा राधाबाई बर्गे इन्हे वैजनाथ भगवान के बारे में पता चला और उनको वैजनाथ भगवान के दर्शन की उत्कंठा होने लगी। वे भी महीने में एक बार दर्शन के लिए आने लगी। गायकवाड़ इन्स्पेक्टर की माँ प्रतिदिन दर्शन को आया करती थी। इसी तरह चिंगुबाईं महादेवराव कासार, अनुसयाबाई सासवडे, वाईकर, तांबटीन आई, तान्हुबाई ढोर इ. अनेक भक्त दर्शन के लिए आया करते थे। तान्हुबाई ढोर यह भक्त तो हर दिन मोळी(जलाने की लकड़ी) बेचकर भगवान को पैसे लाकर दिया करती थी।
उमाबाई सदाशिव पारेकर यह महिला भी वैजनाथ भगवान के दर्शन को आया करती थी। उन्हें कृष्ण महाराज गोगटे इन सत्पुरुष का दर्शन युवा अवस्था मे ही हुआ था। वे कृष्ण महाराज गोगटे स्वामी के दर्शन को आया करती थी। कृष्ण महाराज ने उनसे कहा, “माँ साहेब! कलंकी अवतार ने वैजनाथ नाम से पंचवटी में गरीब ब्राह्मण के घर जन्म लिया हुआ है। वे बडे होने के बाद यहा आएगे तब आप उन्हे पहचानोगी क्या? उमाबाई ने “हा” कहा। इस प्रकार उमाबाई को वृद्ध अवस्था मे वैजनाथ भगवान से भेट हुई। उन्हे देखकर वे रोने लगी। उस दौरान वैजनाथ भगवान की आरती के लिए सैकड़ों लोग जमा हुआ करते थे।
१९४२ में द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। भारत में गांधी आंदोलन शुरू हुआ था। कई देशभक्त भूमिगत हुए थे। उस समय मिलटरी के कई सैन्य अधिकारी और भूमिगत लोग वैजनाथ भगवान के दर्शन कर गए। कॅप्टन भाऊसाहेब तुकाराम शिंदे, राधाबाई राऊत बर्गे के भतीजे सुभेदार महाडीक इ. शिलेदार नारायण भोईटे (जो युद्ध में लंगड़े हुए थे) यह तो मुख़बिरी (जासूसी) से वैजनाथ भगवान के पास आया था। उसने उपर-उपर झुठी मीठी-मीठी बाते कर के पेढे मे से वैजनाथ भगवान पर विषप्रयोग किया था। वैजनाथ भगवान के चाचा को भी चाय मे से जहर दिया गया था। इस कारण भारी रक्तस्राव से उनके चाचा की मृत्यू हो गई।
जब नारायण भोईडे सुबेदार (लंगड़ा) इसने वैजनाथ भगवान पर विषप्रयोग किया था तब वैजनाथ भगवान को कोरेगाँव के पास सासुरणे गाँव ले गए। वहा एक वृद्ध महिला जहर निकाला करती थी। हर शनिवार को सैकड़ों लोग वहा इकट्ठा होते थे। ऊस महिला ने वैजनाथ भगवान को पहचान लिया और बिना कोई पैसे लिए उन्होने उनका जहर उतार दिया और वैजनाथ भगवान को विषबाधा से बचाया। बाद में राधाबाई जिजाबा बर्गे इन्होने सभी भक्तों के साथ वैजनाथ भगवान को सातारा पहुँचाया। विष प्रयोग की दुर्घटना से माता-पिता काफी दुखी थे। बाद में इसी नारायण भोईडे (लंगडा) को भूमिगत लोगों ने मार डाला। और ईस तरह उसे अपने बुरे कर्मों का फल भुगतना पड़ा।
उस समय सोनुबाई मारुती पास्टे (दादी) यह उमाबाई पारेकर इनके पहेचान से वैजनाथ भगवान के दर्शन को आया करती थी। बाद मे उन्होंने ही वैजनाथ भगवान की सेवा की एक ठोस नींव रखी। सोनुबाई दादी के सामने वैजनाथ भगवान पर तीन बार विष प्रयोग हुआ। उस समय उनके सामने रामकृष्ण कोंडो पेंडारकर उर्फ धावडशीकर डॉक्टर रहा करते थे। सोनुबाई दादी ने उन्हे बुलाय। तीन साल तक उन्होंने वैजनाथ भगवान को मोफत दवाए दी और उन्हें विषप्रयोग के संकट से बचाया था। वह डॉक्टर आयुर्वेदिक दवाओं का उपयोग करते थे। वह दत्त भगवान के बहुत बड़े भक्त थे।
बाद में सोनुबाई दादी और उनके पती (मारुती पास्टे) जी को दृष्टांत होकार उन्होने अपनी बेटी का विवाह वैजनाथ भगवान से किया। उनकी पुत्री का नाम आंबू था। वे अंशात्मक थी। यह घटना १९४३ की है। विवाह के समय आंबू तेरह साल की थी। लोगो द्वारा वैजनाथ भगवान को सताया जाना उनसे देखा नही जा रहा था। समाज के कुछ दुष्ट लोगो ने शादी में रुकावटें डालने की कोशिश की। लेकिन उन्होने किसी की नही चलने दी।
एक दिन आंबू ने अपनी छोटी बहन से कहा, “मैं आठ दिनों के बाद जाने वाली हू।” और विशेष रूप से आठवें दिन – विवाह के केवल छह महीने बाद ही उनका स्वर्गवास हो गया। मृत्यु से पहले आंबू ने अपनी माँ सोनुबाई से कहा, “वैजनाथ भगवान को कभी मत छोड़ना।” उसके शब्द को मानकर, सोनुबाई ने अपना घर त्याग कर इकतीस वर्षो तक वैजनाथ भगवान के साथ रहकर उनकी सेवा की। पंचानंवे वर्ष की आयु में सोनुबाई का संगमनेर मे स्वर्गवास हो गया। इसी तरह १९४५ में वैजनाथ भगवान की चाची जनाबाई का सोनुबाई (दादी) के घर मे स्वर्गवास हुआ।
ट्रान्सफर के कारण गायकवाड़ इन्स्पेक्टर की माँ गोदावरीबाई भी वैजनाथ भगवान की याद मे एक दिन पंचतत्व में विलीन हो गई। इसी प्रकार राधाबाई जीजोबा बर्गे, उमाबाई पारेकर यह सारे भक्त भी वैजनाथ भगवान की याद मे पंचतत्व में विलीन हो गए।
सातारा में सात-आठ साल तक रहने के बाद वैजनाथ भगवान माता-पिता और परमभक्त सोनुबाई दादी के साथ कोरेगाँव आए और वहा अपने भक्त भाऊसाहेब जीजाबा बर्गे इनके घर में दो साल तक रहे। वैजनाथ भगवान को कोरेगाँव मे किसी भी तरह का बाहरी उपद्रव नहीं था। मात्र उन्होने भिक्षा से ही अपनी उपजीविका जारी रखी थी।
इसके बाद वैजनाथ भगवान के माता-पिता बीमार हुए। कोरेगाँव से उन्होने वाई जाने का फैसला किया। तदनुसार, कोरेगाँव के सभी भक्तों से विदाई लेकरं वैजनाथ भगवान माता-पिता और सोनुबाई दादी के साथ वाई गाँव मे भगवान हरिहरेश्वर के मंदिर में आए। “बारह साल बाद फिर इसी जगह लौट आओगे।” यह गोरखनाथ महाराज द्वारा की गई भविष्यवाणियों सच साबित हुई थी। वैजनाथ भगवान हरिहरेश्वर के मंदिर मे लगभग पाँच महीने रहे। उनके माता-पिता की बीमारी बढते ही जा राही थी। अवतारी पुरुष के रूप में लोग वैजनाथ भगवान के दर्शन करने आने लगे थे। बाद मे सन १९४८ मार्गशीर्ष शुद्ध ।।५।। सुबह के समय वैजनाथ भगवान की माँ आंबा उर्फ अनुसया माता सती दत्त स्वरूप में विलीन हो गई। अंतिम क्षणो मे माँ को साक्षात योगिनी माता आई हुई नजर आई। पिताजी बिस्तर पर पड़े थे। आंखरी वक्त के दौरान माँ ने सोनुबाई दादी से कहा, “यह बच्चा आपको सौप रही हू। इसका अच्छी तरह से खयाल रखना।” सोनुबाई दादी ने माँ को वैजनाथ भगवान को अच्छे तरीके से संभालने का आश्वासन दिया।
जिस दिन माँ का स्वर्गवास हुआ उस दिन वाई गाँव के सभी भक्तो ने मिलकर चंदा जमा किया और शंकरराव कलेकर सोनार, पंडित माधवराव आदि लोगो को सातारा से खास बुला लिया। सभी लोग इकट्ठा हुए और उन्होंने माँ के पार्थिव शरीर का गाजे-बाजे के साथ अंतिम विदाई दी। उस दिन हलकी-हलकी बारिश हो रही थी। इस असाधारण लेकिन दुखद घटना को देखने के लिए सैकड़ों लोग कृष्णा नदी के पुल पर जमा हुए थे। माँ के स्वर्गवास के अगले दिन लोग शमशान घाट गए। उस समय माँ के गले का मंगलसूत्र और ओटी बिलकुल सही अवस्था मे पाए गए। वे अग्नी मे जले नही थे। यही सच्चे सती के जीवन की कसौटी होती है। माँ के अंतिम संस्कार के बाद गुरुचरित्र का पाठ शुरु किया गया। नागेश्वर भटजी गुरुचरित्र का पाठ पढते थे। वे वैजनाथ भगवान के यहा ही भोजन करते थे।
थोडे दिनो बाद दत्त जयंती का दिन आया। उस दिन, वैजनाथ भगवान की आरती के लिए लगभग २००-३०० लोग आए हुए थे। सोनुबाई दादी आरती कर रही थी। अचानक वहा एक अद्भुत चमत्कार हुआ! वैजनाथ भगवान की माता अनुसूया सती प्रकट हुई। उन्होने अलग ही तेजस्वी रूप धारण किया हुआ था। उनके हाथों में शाही चूड़ियाँ थीं। आरती समाप्त होणे तक वे वैजनाथ भगवान के पास ही खडी रही। फिर अचानक से अदृश्य हो गई। लोगो ने पूछना शुरु किया, “यह औरत कौन है? वे कैसे अदृश्य हो गई?” सोनुबाई दादी ने सारे इकट्ठे लोगों से कहा की, वह साक्षात माता सती अनुसया थीं। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन देर रात तक भजन का कार्यक्रम हुआ। सारे श्रद्धालु भक्तजन रात भर वहीं बैठे थे। उनमे गणपतसिंह यशवंतसिंह परदेसी भी अपने सहयोगियों के साथ उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान अचानक वैजनाथ भगवान के पिताजी का स्वर्गवास हो गया। थोडी ही देर मे यह खबर सारे जमा भक्तों और वहां बैठे लोगों को पता चल गई। लोग चिंतित हुए। रात का समय था। उस समय गणपतसिंह ने वैजनाथ भगवान से बिनती कर के कहा, “थोड़ा रुकिए।” फिर वैजनाथ भगवान ने दत्त भगवान से निवेदन किया की आज आपकी जयंती है। यह पूर्व जन्म मे आपके भी माता-पिता थे। माँ की तेरहवीं होने दो। फिर पिताजी को ले जाए। ऐसा कहकर, वैजनाथ भगवान ने अपने पिता के कान मे फुंककर उन्हें तीर्थ पिलाया। तो क्या चमत्कार! कुछ ही समय में वैजनाथ भगवान के पिता पहले जैसे फिर से उठ बैठे। लोग हैरान हुए। फिर माँ की तेरहवीं हुई। सारे भक्तो से बहुत मदद मिली। पुरणपोली का खाना बनाया गया। गाँव की सुहागण औरतो को कुंकू दिया गया और उनको दूध बाटा गया।
तेरहवीं के बाद चौदहवें दिन मात्र वैजनाथ भगवान के पिताजी का स्वर्गवास हो गया। जैसे की दत्त भगवान ने वैजनाथ भगवान के शब्दों को स्वीकार कर पिताजी की मृत्युलोक की अवधि दो से तीन दिनों तक बढ़ा दी थी। उनकी भी अंत्यविधी व्यवस्था अच्छे तरिके से की गई। गाँव के भक्तो ने वैजनाथ भगवान के माता-पिता के नाम से मासिक भोजन कराना शुरू किया। वैजनाथ भगवान ने अपने माता-पिता की अस्थियों को अच्छी तरह संरक्षित किया(बचाकर रखा) था। उनकी समाधी के लिए श्री. गणपतसिंह माधवसिंह परदेशी ने बावधन रोड पर अपने खुद के खेतों में जगह दी। उससे जुडे सारे सरकारी कागझाद किये गए। साल के अंतः तक लोगों ने चंदा जमा कर वैजनाथ भगवान के माता-पिता की एक ही जगह अगल-बगल मे समाधी का निर्माण किया।
स्वर्गवास के एक साल बाद श्राध्द के दिन अस्थियों का गाजे बाजे के साथ जुलूस निकाला गया। ढोल, लेझीम, डफ बजाते हुए जुलूस समाधी स्थल पर आया। अस्थीयो को समाधी मे रखकर उसके उपर चार पादुका, नंदी और पिंड की स्थापना की गई। सभी भक्तों ने सहभोजन किया। आज भी यह समाधी वाई गाँव मे देखने मिलती है और कई भक्तजन आज भी इस समाधी के दर्शन के लिए जाया करते है।
बाद में वाई मे ही सीताबाई कढणे सोनार, चिंचकर बाई तेली, अभ्यंकर गुरुजी, गजानन शंकर पिंजरे ऐसे अनेक भक्तो के घर वैजनाथ भगवान का कुछ समय तक रहना हुआ। बाद मे समाज के कुछ दुष्ट लोगो द्वारा तकलीफ के कारण और सोनुबाई दादी पर हुए विष प्रयोग के कारण वैजनाथ भगवान वाई छोड़कर १९४९ के आसपास संगमनेर आ गए। सातारा मे रहते दौरान वैजनाथ भगवान की रेवननाथ और मत्स्येन्द्रनाथ महाराज से भी भेट हुई थी।
संगमनेर में वैजनाथ भगवान सबसे पहले सालिवाड़ा इलाके मे लहानू बनाजी के यहा आए। वहा उनकी मुलाकात श्री. गणपतिसिंह सरदारसिंह परदेसीजी से हुई। पहले इन्हीके ही घर में वैजनाथ भगवान के माता-पिता रहा करते थे और वैजनाथ भगवान का जन्म भी इन्हीके ही घर मे हुआ था। कई वर्षों की मुलाकात के बाद भी, गणपतिसिंह ने वैजनाथ भगवान को पहचाना। उन्हे आश्चर्य हुआ और वे खुश भी थे। बाद मे वैजनाथ भगवान श्री. माधवराव शिंगारे इनके यहा रहने लगे। यहां रहते हुए सोनुबाई दादी को विष प्रयोग के कारण शुरु हुई तकलीफ पाटिल डॉक्टर के दवाई से ठीक हो गई। इस कार्य के लिए बहुत लोगों ने आर्थिक सहायता की थी। वैजनाथ भगवान संगमनेर मे आए है इस बात पता चलते ही बहुत से लोग दर्शन के लिए आने लगे। वैजनाथ भगवान की भावसमाधी जारी थीं। संगमनेर में भक्तों को भावसमाधी के प्रकार देखने का सौभाग्य मिला। सातारा से ही वैजनाथ भगवान को भावसमाधी लगना शुरू हुआ था। आरती के दौरान वैजनाथ भगवान की समाधी लग जाती और समाधि अवस्था में ‘दत्तात्रेय कहे!’ ऐसी अभंगवाणी निकलती। लगभग आधे घंटे के बाद वे समाधी अवस्था से बाहर आते। ऐसा हर दिन होता था। चार महिनों तक वैजनाथ भगवान वहा रहे। बाद में भक्त उन्हें वेल्हाळे गाँव ले गए।
उस गाँव में वैजनाथ भगवान के परम सेवक बजाबा पाटील और निवृत्ती वाल्हेकर इन्होने उनकी देखभाल की। बाद में, वैजनाथ भगवान कासरवाड़ी मे गाडे पहलवान इनके यहा रहने चले गए। वहाँ के रेसिडेंट मजिस्ट्रेट श्री. रामभाऊ वाघमारे, गाडे पहलवान नियमित रूप से वैजनाथ भगवान के दर्शन को आया करते थे। उनके परिचय से कई अन्य भक्तो का भी आना शुरु हुआ। वहा पर मेहेरबाबा और साईंबाबा ट्रस्ट के कुछ लोग आकर गए। संत तुकडोजी महाराज के शिष्यों के भजन भी हुए। वहा रहते समय, समाज के कुछ पढ़े-लिखे दुष्ट लोगो ने वैजनाथ भगवान को काफी परेशान किया। फिर वहां से निकलकर वैजनाथ भगवान राजापुर में किसानराव हासे इनके यहा दो-चार महिनो तक रहे। बाद में वडगाँव लांडगा रहने चले गए। समाज के कुछ दुष्ट लोगो द्वारा परेशान किए जाने के कारण सोनुबाई दादी और वैजनाथ भगवान विभाजित हुए। बाद में सोनुबाई दादी ने किशनराव हासे जी के यहा आकर रहना शुरु किया। कुछ दिनो बाद उन्हे वाई मे वैजनाथ भगवान के माता-पिता के समाधी के दर्शन की इच्छा हुई। तब वैजनाथ भगवान, सोनुबाई दादी और गजानन शंकर गिजरे इनका बेटा विजय आदि. वाई जाने के लिए निकल पडे। पहले वे सब पुणे शहर पहुचे। वहा से कुछ दुष्ट लोगों ने गुप्त रूप से उनका पीछा किया और वे वैजनाथ भगवान के साथ वाई बस स्टॅन्ड पर उतर गए। तब वहा अचानक एक घटना हुई। पीछा कर रहे उन दुष्ट लोगो ने और बस के कुछ दुष्ट कर्मचारीयो ने वैजनाथ भगवान को लाठियों से पीटाना शुरु किया। उनके अभंग, दोहरे, ग्रंथो की किताबे और उनका अन्य सामान उनसे छिन लिया। और उन्हें बिना सामान, ग्रंथ दिए ही बस स्टॅन्ड से निकाल दिया। ग्रंथो को छिने जाने के कारण वे सारे दुखी अंतःकरण से वहा से चले गए। उनकी आँखों से आँसू थे। वहा से वे सातारा मे शंकरराव कळेकर इनके यहा गए। अपने साथ हुई सारी घटना उन्हे बताई। उस समय कळेकरजी ने उनके विश्वास के कुछ लोगो को वाई बस स्टॅन्ड पर भेजा और ग्रंथो, सामान आदि. के बारे में पूछताछ करने कहा। ग्रंथो की किताबे और अन्य सामान बस स्टॅन्ड के रूम में होने का पता चला। दो-तीन दिनों बाद कळेकराजी ने वैजनाथ भगवान, विजय और सोनुबाई दादी को वापस कोरेगाँव भेज दिया। कोरेगांव में वे सारे भक्त चिंगुबाई कासार की पहचान से दत्तात्रेय भाऊसाहेब बर्गे इनके यहा रहने लगे। ग्रंथो को लुटे जाने की खबर देखते-देखते सारे इलाके में फैल गई। बाद में, भक्तों ने चंदा इकठ्ठा कर वैजनाथ भगवान, विजय और सोनुबाई दादी को वापस संगमनेर भेज दिया। वहा से वे सारे वडगाँव लांडगा चले गए। उस समय वडगाँव लांडगा मे श्री. राजाराम ओमकार माळीजी गुरुजी थे। वे वैजनाथ भगवान के बड़े भक्त थे। वे नियमित रूप से दर्शन को आते थे। वैजनाथ भगवान जब वडगांव लांडगा मे रहते थे तब उनकी सहाय्यता से उन्होंने सारे ग्रंथो के किताबो की संख्या पहले ही लिखकर रखी थी।
वाई में घटी हुई सारी घटना वडगाँव मे सभी भक्तो को पता चली। सारे लोग दुखी हुए। उन्होंने आपस में चंदा इकठ्ठा किया और माळी गुरुजी को वाई भेजने का फैसला किया। इस कार्य मे डॉ. हांडे मास्टर, गणपतराव लांडगे मास्टर और राधूशेट दुकानदार आदि. गाँव के मुख्य सदस्यों ने जिम्मेदारी ली। विजय के पिता वाई मे ही थे। उसने अपने पिता को एक पत्र भेजा और बस स्टॅन्ड से सारे सामान और ग्रंथो की किताबो को घर लाकर रखने को कहा और माळी गुरुजी सामान लेने आ रहे है इस बात की खबर भी उन्हे दी। पत्र के अनुसार विजय के पिता बस स्टॅन्ड से वैजनाथ भगवान का सामान और ग्रंथ ले आए और उसे पढते बैठ गए। कुछ समय बाद माळी गुरुजी वहाँ पहुचे और उन्होंने उनसे सारे सामान की माँग की। बिना कोई संकोच किए उन्होंने सारा सामान माळी गुरुजी को सौप दिया। एक दिन वहा रहकर अगले दिन माळी गुरुजी वैजनाथ भगवान के सारे सामान को वडगाँव लांडगा वापस ले आए। ग्रंथो को वापस पाकर सभी खुश थे। सभी ने मिलकर एक साथ सहभोजन किया। यह घटना १९५४ साल में हुई थी। उस समय कर्पे वकील वहा मौजूद थे। यहा वाई मे ग्रंथो को लूटनेवाले बस कर्मचारियों से पूछताछ हुई। कोरेगांव सातारा में एस.टी. बस अधिकारी श्री. पाटिल ने खुद जाकर भक्तों के बयान लिए। बादमे उन दोषी एस. टी. बस कर्मचारियों को काम से निकाल दिया गया। हालांकि, वैजनाथ भगवान ने इस संबंध में कोई भी शिकायत दर्ज नहीं की थी।
बाद में, वैजनाथ भगवान वडगाँव लांडगा मे दो साल रहे। वहां रहते हुए, भारत भक्ति सांप्रदाय की स्थापना हुई और विश्व धर्म की नींव रखी गई।
उसके बाद वैजनाथ भगवान पोखरी बाळेश्वर गाँव गए। चार-पांच महीने वहा रहने के बाद, वे वापस वडगांव लांडगा लौट आए। प्रसिद्धी बढ़ रही थी। बाद में भक्तों ने उन्हें पिंपलगाँव निपाणी ले जाने का फैसला किया। पिंपलगाँव निपाणी मे शंकर बाबा गोसावी ने अपनी जगह वैजनाथ भगवान को रहने के लिए दी। शंकरबाबा की संपत्ति और पैसे गाँव के लोग के पास थे। वे सारे पैसे और अधिक चंदा जमा कर वैजनाथ भगवान को आश्रम बांधकर देने का फैसला किया गया। बाद में, शंकरबाबा ने अच्छी जगह देख के वैजनाथ भगवान के लिए एक आश्रम बांधकर दिया और उनके बैठने के लिए एक आसन भी बनाया। श्री. गोपाल खंडूजी झापटे प्रतिदिन वहाँ बड़ी भक्ति भाव के साथ आरती करते हैं और वहा की सारी व्यवस्था देखते हैं। उनकी आवाज बहुत सुरीली है। बडे कार्यक्रमो मे वे बडे भक्ती भाव से वैजनाथ भगवान द्वारा लिखे हुए राम पाठ को पढते है। सभी भक्त बहुत शांति से पाठ सुनते हैं और मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इसके अलावा, भोजन से पहले, अच्छे आवाज मे श्लोक कहने का सन्मान भी श्री. गोपाल खंडूजी झापटे इन्हे दिया गया है। अन्य भक्त भी वैजनाथ भगवान के दर्शन के लिए वहा पर आते हैं। यही पर वैजनाथ भगवान द्वारा राम पाठ, विठ्ठल पाठ, हरी पाठ और एकेश्वरण कृष्ण पाठ इन चार पाठो को लिखा गया। यह घटना १९५७ की है।
बाद में वैजनाथ भगवान की ब्रम्हस्थिती जागृत होकर उनके द्वारा कई ग्रंथों और अभंगों को लिखा गया। यहां श्रद्धालुओं ने अभंगो और ग्रंथो की सुरक्षा के लिए पांच सदस्यओ की कमिटी की स्थापना की। इस कार्य मे श्री. रावसाहेब वाकचौरे पाटील, गोपाळा झापटे, कारभारी वाकचौरे, यादवबाबा, भीमबाजी, भगवान, पंढरीनाथ पाटील आदि. भक्तो से बहुत मदद की।
लेकिन बाद में, गाँव के कुछ कर्मठ और राजकारणी षडयंत्री लोगो ने वैजनाथ भगवान को तकलीफ देना शुरू किया। उनके करीबी भक्तों को यह बहुत बुरा लगा। उनकी मदद से, वैजनाथ भगवान ने पिंपलगाँव निपाणी को छोड़ने का फैसला किया और वे संगमनेर में श्री. भाऊसाहेब देशमुख अंभोरकरजी के यहा आकर रहने लगे। अंभोरकरजी के यहा रहने के दौरान वैजनाथ भगवान की कुंडलिनी जागृत हुई। उसी दौरान कुछ राजकारणी और कर्मठ लोगों द्वारा वैजनाथ भगवान पर विष प्रयोग किया गया। इस कारणवश वैजनाथ भगवान बहुत बीमार हो गए। वे भोजन नही करा पा रहे थे। उस वजह से सोनुबाई दादी बहुत डर गई थीं। उस वक्त वैजनाथ भगवान छह महीने तक केवल दूध पर थे। इस बिमारी के दौरान सोनुबाई दादी, तुकारामबुवा शिदे, आनंदसिंग परदेशी, टाहकारी गाँव के रामकृष्ण बाबा और वैजनाथ भगवान काफी चिंतीत हुए। कुछ सुझ नही रहा था। लेकिन ईश्वरी लीला अगाध है। अचानक दरवाजे पे टुरिग़(पुराणे जमाने की रिक्षा) आकर खडी हो गई। हर कोई हैरान था। वैजनाथ भगवान को उस टुरिग़ से पुणे के ग्रँड अस्पताल मे लाया गया। उन्हें सात-आठ दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। सात सौ से आठ सौ रुपये खर्च हुए। बाद में, ग्रँड अस्पताल में किसी ख्यिश्चन डॉक्टर ने दवाई की आड मे वैजनाथ भगवान पर विषप्रयोग किया। उस मे से भी वे सही सलामत बच गये। इस बात से वहा के सिस्टर्स और अन्य डॉक्टर भी हैरान हुए।
बादमे वैजनाथ भगवान ने ग्रँड अस्पताल से जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलने पर, वैजनाथ भगवान को वापस संगमनेर ले जाने का फैसला किया। उस समय आनंदसिंग परदेशी के भाई श्री. नरेंद्रसिंग ठाकोर उर्फ किशोर ने अस्पताल से जाने के लिए टुरिंग की व्यवस्था की। वैजनाथ भगवान ने कपड़े बदले और वे संगमनेर जाने के लिए टुरिंग मे बैठ गए। अभ्यंकर गुरुजी भी उनके साथ थे। वे आधे रास्ते मे अपने घर जाने के लिए उतर गये। बाद मे वैजनाथ भगवान अन्य सभी भक्तो के साथ अंभोरकरजी के यहा आए। ग्रँड डॉक्टर द्वारा निर्धारित दवा साथ मे लाए ही थे। वडगांव लांडगा के डॉ. हांडे मास्टर ने भी कुछ दिनों के लिए वैजनाथ भगवान को दवाई दी। बीमारी के दौरान शुरुआत में केवल दूध, फिर दूध पाव और फिर दूध भाकरी इस प्रकार वैजनाथ भगवान के खाने मे बदलावं हुआ। साथ-साथ डॉक्टर की सलाह भी चल ही रही थी।
अंभोरकरजी के यहा रहेने के दौरान श्री. देवराम बापू जाधव समनापूरकर वैजनाथ भगवान के दर्शन को आने लगे। अंभोरकरजी के यहा कुछ कार्यक्रम हुए। एक दिन देवराम बापू ने वैजनाथ भगवान से अनुरोध किया की, “आप के पैर हमारे घर को लगे, यह हमारी इच्छा है। आप हमारे घर आए।” वैजनाथ भगवान ने उनकी बिनति मान ली और इस प्रकार देवराम बापू जाधव इनके घर जाने का फैसला हुआ। अगले दिन वे वैजनाथ भगवान को बैलगाड़ी में से अपने खेत वाले घर मे भोजन के लिए ले गए। वहा का सभी शांत वातावरण और गाँव से दूर एकांत स्थान को देखते हुए, वैजनाथ भगवान ने देवराम बापू से कुछ दिन वहा रहने की इच्छा प्रकट की। देवराम बापू ने तुरंत हामी भर दी और अगले ही दिन वैजनाथ भगवान का सारा सामान बैलगाड़ी से वे घर ले आए। इस प्रकार, वैजनाथ भगवान आंभोरकरजी के घर से देवराम बापू के घर आए। वहा वैजनाथ भगवान के रहने के लिए जो कमरा था वो काफी छोटा था। उस कारणवश वैजनाथ भगवान के बैठने का आसन और खाना पकाने की जगह दोनो की समस्या हो रही थी। तब बाजीराव पाटिल और बाबूराव शेटे और अन्य भक्तों ने चंदा जमा किया और वैजनाथ भगवान के कमरे की मरम्मत की। दो अलग-अलग कमरे निकाले। रसोई और बैठक को दो भागों में विभाजित किया गया। वैजनाथ भगवान के बैठने के लिए आसन भी बनाया। वहाँ रहते समय वैजनाथ भगवान द्वारा ज्ञानदेव पाठ और दत्त पाठ लिखा गया। बाकी अन्य ग्रंथो और अभंगो को लिखने का कार्य भी जारी था। देवराम बापू ने लगभग चार वर्षों तक वैजनाथ भगवान की अच्छी सेवा की। उनके बच्चे भी वैजनाथ भगवान की पूजा करते थे। गाँव-गाँव मे कलंकी वैजनाथ भगवान के भक्त धीरे-धीरे बढ़ने लगे। एक संदेश पुस्तक प्रकाशित करके वैजनाथ भगवान के कार्य की जानकारी लोगो तक पहुंचाई गई। पुणे, वाई, नासिक और आस-पास के गाँवों से कई लोग इकट्ठा होने लगे। भक्त बढ़ने लगे और वैजनाथ भगवान के लिए शहर के नजदिक एक भव्य आश्रम बने ऐसा लगने लगा।
सौभाग्य से उसी दौरान श्री. मुरलीधर विठ्ठलराव नवले इनकी नगर रोड के पास की जगह बेचन के लिए निकली थी। पुणे के भक्त श्री. फुलचंद केसरचंद बागमारजी ने वैजनाथ भगवान के नाम पर लगभग ३३०० स्केवर फिट जगह खरीदी। इस धार्मिक कार्य को देखते हुए श्री. मुरलीधर विठ्ठलराव नवलेजी ने लगभग २२०० स्केवर फिट जगह आश्रम को दान दीं। इससे जुडी सारी कागजी कारवाई पुरी की गई। और इस प्रकार वैजनाथ भगवान के आश्रम के लिए लगभग ५५०० स्केवर फिट जगह उपलब्ध हुई।
इस जगह पर आश्रम का निर्माण कार्य जरुरी था। इसे ध्यान में रखते हुए आस-पास के सभी भक्तों ने जितना संभव हो ढाई-सौ से आठ-सौ रुपये तक चंदा दिया। कम पैसे देनेवाले भी कई भक्त थे। बाद में आश्रम का निर्माण कार्य, रखरखाव और अन्य काम करवाकर लेने की बहुत आवश्यकता थी। इस कार्य के लिए परम भक्त श्री. निवृत्तिनाथ हनुमंता वाल्हेकरजी ने अपना गाँव छोडकर आश्रम के निर्माण कार्य मे खुद्द को झोक दिया। वे पहले वेल्हाळे गाँव में रहते थे। वह गाँव वाल्हेकरजी के पूर्वजो से था। उनका व्यवसाय कंबल की बिक्री और कंबल का व्यापार था। आश्रम की नींव से लेकर भवन के पूरा होने तक उन्होंने कडी मेहनत की और सहयोग किया। गाँव-गाँव घुमकर आश्रम के लिए भक्तों से दान जमा किया और वैजनाथ भगवान के लिए आश्रम का निर्माण किया। वे अपने परिवार के साथ आश्रम मे प्रति दिन आरती करते थे और अन्य दैनिक गतिविधियों का भी निरीक्षण करते थे। उन्होने आश्रम के बगल मे ही घर बनाकर रहना शुरु किया। वैजनाथ भगवान की सेवा मे उन्होने खुद्द का जीवन झोक दिया और मनोभाव से सेवा की। श्री. देवरामबापू भी वैजनाथ भगवान को कही लाने-ले जाने की जिम्मेदारी बडी श्रद्धा से निभाते थे। अन्य भक्तों ने भी इस कार्य मे यथासंभव सर्वोत्तम योगदान दिया। उस समय सोनुबाई दादी भी वैजनाथ भगवान के साथ थीं।
आश्रम का काम १९६८ में पूरा हुआ। बाद में वैजनाथ भगवान सोनुबाई दादी के साथ आश्रम में रहने लगे। बगल मे निवृत्तिनाथ वाल्हेकर अपने परिवार के साथ रहते थे। यहा भी वैजनाथ भगवान और सोनुबाई दादी को कुछ कर्मठ और राजनीतिक लोगों ने तकलीफ दी। बाद में सोनुबाई दादी को पक्षपात(लक़वा) और मधुमेह हो गया। और उसी मे मार्गशीष वद्य नवमी गुरुवार सन १९७२ को शाम 6 बजे उनका स्वर्गवास हो गया। वे दत्त स्वरूप मे विलीन हो गई। सोनुबाई दादी ने ३१ साल तक वैजनाथ भगवान की मनोभाव से सेवा की। अपना घर छोडकर, भिक्षा मांगकर अनन्य भाव से सेवा की। इसके स्मरण रूप में श्री. कलंकी वैजनाथ वैजनाथ आश्रम में उनका एक छोटासा मंदिर स्थापित हैं। भक्त जण वैजनाथ भगवान के दर्शन के साथ साथ राम अवतार मे शबरी समझे जानेवाली सोनुबाई दादी के भी बडे भक्ति भाव से दर्शन और पूजा करते हैं।
आश्रम मे रहने के दौरान कलंकी वैजनाथ भगवान को थोडा स्वास्थ्य लाभ हुआ और कार्य को स्थिरता मिली। लेकिन दुनिया में जिस तरह हिरण जैसे सुंदर जीव हैं उसी तरह बाघ, शेर जैसे क्रूर जानवर भी हैं। सुगंधित चंदन जैसे पौधे हैं, उसी तरह बाबुल के कांटेदार पेड़ भी हैं। इसी तरह, वैजनाथ भगवान पर श्रद्धा रखनेवाले अनन्य भक्त हैं और उनको तकलीफ देने वाले दुष्ट, क्रूर लोग भी हैं। दुष्ट लोगो द्वारा किये गए षडयंत्रो के कारण वैजनाथ भगवान को मधुमेह और रक्तदाब की तकलीफ शुरु हुई। डॉ. ठाकुर और डॉ. गंगवाल ने समय-समय पर दवा देकर उन्हे बेहतर महसूस कराया। साथ साथ पथ्य-पानी भी जारी था। लेकिन यह एक धार्मिक कार्य है। अंतहीन आपदाओं का सामना करते हुए शुरु किया हुआ कार्य अंतः तक पहुचाना है। ईश्वरी की सहायता साथ मे है ही। कई अधिकारी, मजदूर, किसान दर्शन के लिए आते है। वैजनाथ भगवान द्वारा लिखित ग्रंथो को देखकर उन्हे आश्चर्य होता है। किसी जादू की तरह उनके स्वभाव मे बदल हो जाता है। यह वैजनाथ भगवान के कार्य का असर है।
श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान का महानिर्वाण आषाढ शुद्ध ।। १० ।। सोमवार सन ६ जुलाई, १९८७ को संगमनेर मे उनके आश्रम मे हुआ।
श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान की शिष्या श्री. संत बेबीनाथ माया ने श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान के कार्य को आगे जारी रखा है। वडगाँव लांडगा मे श्री. संत बेबीनाथ माया इनका एक आश्रम, दत्त मंदिर और ध्यान मंदिर है। माताजी द्वारा भी अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों को लिखा गया है और उनके द्वारा अभंगवाणी आज भी जारी है। कई भक्त आज भी श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान के समाधि के दर्शन करने आते है और उनके द्वारा लिखे अध्यात्मिक ग्रंथो के ज्ञान का लाभ उठाते हैं। साथ साथ श्री. संत बेबीनाथ माया के दर्शन और ज्ञान का लाभ लेकर भी कृतार्थ हो जाते है।
