श्री संत बेबीनाथ माया चरित्

श्री संत कलंकी बेबीनाथ माया

ॐ ब्रह्मस्वरूपिणी कलंकी बेबीनाथ माया अल्पचरित्र

। माया ब्रम्हाचीय बारे अवतार । दत्त हा साचार जाणा बने ।।
। कोल्हाटी ते माया बारे येत नाही । तयाची पाहे कळुनिया ।।
। अवतारे यांचे सगुण दर्शन । येतसे घडुन सुकृताने ।।
। वैजनाथ म्हणे युगायुगी राहे । येणे जाणा पाहे तयासाठी ।।
( कलंकी देव त्रैमूर्ति पाठ – १४ )


वंश परिचय

अहमदनगर जिले के संगमनेर तालुका का एक छोटासा गाँव। कडलग नाम के अधिकांश लोग इस गाँव में रहते है। इसीके चलते इस गाव का नाम ‘जवळे कडलग’ गिर गया। सह्याद्री की गोद मे स्तिथ यह गाँव पहाड़ों और घाटियों से घिरा हुआ है। आढळा नदी के तट पर बसा यह गाँव बारह माह हरियाली से भरा हुआ दिखता है। पानी के पर्याप्त मात्र मे होने की वजह से गन्ने और अंगूर के लिए यह एक प्रसिद्ध स्थान है। इसी कारण अनेक मजदूर लोग व्यवसाय करके अपनी उपजीविका के लिए इस गाँव में आकर रहने लगे। गाँव का मुख्य व्यवसाय खेती है, इसलिए कई अन्य निवासी इस गाँव में खेती और उससे जुडे अन्य कार्यों के लिए रहते थे। इनमें कृषि उपकरण और घर बनाने का लकड़ी काम करनेवाले स्व. म्हातारबा कदम एक सज्जन व्यक्ति थे। सुतार काम यह उनका पिढी जात व्यवसाय था। विश्वकर्मा उनके कुलदेवता थे। लेकिन शिव भक्ति का उनके परिवार में एक विशेष स्थान था। उनकी धर्मपरायणता के कारण, वे सभी को प्यारे थे। लकड़ी के औजार बनाते समय, रामायण और महाभारत की कथाए बताकर वे सारे किसानों को मंत्रमुग्ध कर देते। अपने सरल स्वभाव के कारण उनकी आर्थिक परस्थिति लगभग सामान्य ही थी। उनके घर दो तीन बेटियां ने जन्म लिया परंतु उसमे से कोई नहीं बची। केवल एक पुत्र सदाशिव यही वंश का वारीस बच गया था। सदाशिव अपना पुश्तैनी कारोबार करते थे। सदाशिव नाम के अनुसार शिव भक्त थे। वे शिवलीलामृत ग्रंथो का पारायण करते। उन्हे तिरथयात्रा करना, भजन, प्रवचन सुनना काफी पसंद था। उनकी पत्नी का नाम लक्ष्मीबाई था। नाम के अनुसार वे भी माता लक्ष्मी की भक्त थीं। देवी की अपनी दैनिक पूजा के कारण उन्हें अक्सर देवी के दृष्टांत होते थे। लक्ष्मीबाई को तीन संतान हुए। उनके नाम त्रंब, चंद्रभान और निवृत्ती थे। उनमें से, श्री. चंद्रभान का जन्म अप्रैल १९२४ में हुआ था। वही श्री. संत बेबीनाथ आदिमाया शक्ति अवतार के पिता थे। वे दूसरी कक्षा तक पढे-लिखे थे। फिर भी, उनमे कई सारी कलाए थी। भजन-कीर्तन करना, पत्थरो को तराशकर मूर्ती बनाना, ग्रंथो का पाठ करना और अन्य कई उत्कृष्ट कृतियों में वे समृद्ध थे। उनकी पहली शादी सन १९४२ में भागीरथी नाम की एक साध्वी स्त्री से हुई थी। उनका एक बच्चा था। उसका नाम दत्तात्रय था। लेकिन सन १९५० मे भागीरथी ने अपनी इहलोक(मृत्युलोक) की यात्रा समाप्त कर दी। उसके बाद, एक-डेढ़ साल में, यानी सन १९५१-५२ में चंद्रभान का विवाह नासिक शहर की एक लड़की से हुआ। उनका नाम भी भागीरथी ही रखा गया। उस वक्त चंद्रभान बारह साल तक नासिक में रहे। उसमें से तीन साल वे चांदवड में रहे और दो साल वे भगूर में रहे। शादी के बाद एक-देढ साल तक भागीरथी को लगातार देवी के दृष्टांत होने लगे। सफ़ेद साडी पहनी हुई और कुमकुम तिलक लगाए हुए एक दिव्य स्त्री आती और उनसे कहती, “मैं तुम्हारे घर आना चाहती हू।” फिर एक दिन दोपहर के लगभग दो बजे जब वे घर में अकेली थी तब एक तेजस्वी पुरुष उनके सामने आकर खडे हो गए। वे सिर्फ उन्हे ही दिखाई पड रहे थे। शुरू मे डर के मारे वे चिल्लाने लगी। लेकिन बाद मे लगभग आधे घंटे तक उस तेजस्वी पुरुष ने उनके साथ बातचीत की और उनको माता आदी शक्ति के जन्म की पूर्व सूचना दी और फिर अदृश्य होकर चले गए। चंद्रभानजी को भी भगवान बजरंगबली का दृष्टांत होकर उनको भी माता आदी शक्ति के जन्म की पूर्व सूचना दी गई।


जन्म और बचपन

उस समय श्री. चंद्रभान मिस्त्री और उनका परिवार नासिक शहर के डिंगार इलाके में मुळे पाटील जी इनके घर में रहता था। चैत्र महीना चल रहा था। सन १९५३ , १३ अप्रैल मंगलवार का दिन था। सुबह छह बजे से भागीरथीजी को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। बाद मे कुछ समय बाद उनके गर्भ पर नाग की छाया गिरी और वे बेहोश हो गई। बाद में गौरी स्वरूप एक सुंदर लड़की का जन्म हुआ। सुबह के सात बज रहे थे। घर में पहली बेटी के रूप में सभी जन उसे बेबी के नाम से पुकारने लगे। बाद में, कलंकिनी बेबीनाथ माताजी के लिखाण में भगवान विष्णु के नाभी(बेंबी) से जन्म होने के कारण बेबी यह नाम धारण किया ऐसा वर्णन है। साथ ही उनके माता-पिता चंद्रभान और भागीरथी यह दक्ष राजा के समय क्षत्रिय परिवार में थे। रामावतार मे भी वहा के क्षत्रिय परिवार मे उनका जन्म हुआ था और माता सीता को रावण से छुड़ाने मे उनसे मदद मिली थी। इसलिए उनकी इच्छा के अनुसार कलंकिनी माता ने उनके घर मे जन्म लिया था। बेबी के साथ चंद्रभान मिस्त्री का परिवार जवळे कडलग गाँव लौट आया। यह लड़की खेलने-कुदने और बात करने में अन्य लड़कियों से अलग थी। लेकिन उस समय उनके माता-पिता को इस बात का गौर नही हुआ। बेबी का वही नजदिक के स्कूल मे दाखला कराया गया। लेकिन शिक्षा मे उनका मन नही लगता। ज्यादातर समय, वे आढळा नदी के किनारे स्थित भगवान आढळेश्वर के मंदिर में जाकर बैठ जाती और अकेले ही शिवलिंग से बात करते रहती। यह शिव मुझसे क्यों नहीं बोलते इस बात का उनके बालमन को पीडा होती। कभी-कभी मंदिर मे से एक आवाज़ आती, “बेटा, तुम अभी छोटी हो। आगे चलकर मेरा सगुण रूप तुम्हे मिलेगा।”
फिर भी वह बालमन संतुष्ट नहीं होता। एक दिन सात-आठ साल की आयु मे स्कूल जाने के बजाए बेबी आढळेश्वर के मंदिर के बाहर जिद्ध पकडकर बैठ गई और मन ही मन मे संकल्प किया की, “हे शिव अभी अगर तुमने दर्शन नही दिया तो मैं देहत्याग कर दूंगी।“ गर्मी के दिन थे। क्षण क्षण मे जमीन गर्म हो रही थी। दोपहर के बारह बज चुके थे। बालिका का हट्ट देखकर भोले शंकर को रहा नही गया। उन्होने बेबी को वे मंदिर से बाहर आ रहे है ऐसे दिखाया और उसे गले लगाने के लिए वे आगे बढे। लेकिन उनका वह जटाधारी और त्रिशूल डमरूधारी भयंकर रूप देखकर बेबी भयभीत हो गई। वह डर के मारे काँपने लगी और दौड़ने लगी। उस समय प्रभु ने उससे कहा, बेटा इस जन्म मे तुम्हें बहुत सारी व्याधी दुःख झेलना पड़ेंगा। आप नाथ महाराज(नवनाथ) के पास जाओ, आगे चलकर मै आपको भेट दूंगा ही। ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गए और फिर बेबी घर लौट आई।


गृहस्थाश्रम जीवन

बेबी की शिक्षा चौथी कक्षा तक हुई। १४ वर्ष की आयु से ही उन्हें शादी के लिए रिश्ते आने लगे। परंतु उनकी शादी करने की कोई इच्छा नही थी। लेकिन पिताजी के आगे उनकी एक न चलने वाली थी। बेबी को दो भाई-बहन थे। बहन दगडाबाई और भाई नाना। इन दोनो की जिम्मेदारी भी माता-पिता पर ही थी। इसलिए, सन १९६७ में चौदह वर्ष की आयु में उनका विवाह धांधरफल के श्री. नाना रामभाऊ वाकचौरे इनके साथ संपन्न हुआ। वे कपड़े सिलने का काम करते थे। छह महीने अपने ससुराल धांदरफल मे रहने के बाद उनकी ससुराल की तकलीफ शुरू हो गई। कई शारीरिक बीमारियों ने उन्हे जकडं लिया। उनकी अंतःस्फूर्ती जागृत हो रही थी। उसकी पीडा से वे दर्द से चिल्ला उठती। अन्य लोगों को लगता की वे भूतों द्वारा प्रेतवाधित हैं। इसलिए उन्हें नगर शहर के पास स्थित मिरवली बाबा (मुख्य स्थान – मीननाथ सिद्ध) के पहाड़ी पर ले जाने लगे। साल में करीब करीब सात से आठ महीने वे वहां रहती थी। उन्हें चार बच्चे हुए। उनमें से मीना और फकीरा यह दो बच्चे ही जी पाए। लगभग १४ वर्षो तक वनवास जैसे उनका जीवन व्यतीत हुआ। उनका निमगाँव, हनुमंतगाँव, पोहेगाँव, राजापूर, वडगाँव लांडगा, संगमनेर इन सब जगहो पर निवास हुआ। उनके पती टेलर का व्यवसाय करके उन्हे पैसे मुहैया कराते। कभी कभी उन्हे पैसो की कमी होती। इस कारणवश नगर के पहाड पर रहते समय कई बार उन्हे भिक्षा मांगकर उपजीविका करनी पडी। पानी तो उन्हे पहाड के नीचे से ले जाना पड़ता। अपने दो बच्चों के साथ वे वहा रहती थी। पती बीच-बीच मे आते जाते रहते थे। यहाँ माँ-बाप की परिस्थिती भी कुछ खास नही थी। एक बार तो दीवाली भी उन्हे सिर्फ उबले हुए आलू खाकर बितानी पडी थी। फिर वे अपनी बेटी की मदद कहां से कर सकते?
नगर के पहाड पर रहते समय उनका चार महीने का बच्चा गुजर गया। परंतु उसका अंत्यविधी करने उनकी मदद के लिए कोई नहीं आया। उस समय बेबीमाया ने अपने बच्चे का अंतिम संस्कार स्वयं: अपने  हाथो से किया। दुखी अंत:करन से वे नगर के पहाड से नीचे उतरी। बहुत धूप थी। वे नंगे पैर चल रही थी। उनके पास एस.टी. बस किराया भी नहीं था। फिर भी वे बस स्टैंड तक पहुंच गई। उस समय, भगवान कृपावंत हुए और उन्होने एक मुजावर(दरगाह की चढ़त लेनेवाला फ़कीर) के रूप मे उन्हे मदद की और वे वडगाँव लौट आई। १४ वर्षो तक उन्होने यह सारी तकलीफ झेली थी। उनका नगर के पहाड पर बीच-बीच मे आना-जाना शुरू ही था। उस समय नगर के पहाड के मुजावर ने कहा, “अब तुम्हारा अंत हो जाएगा और तुम्हारा अंत्यविधी यही करना पडेगा।” उस समय बेबीमाया के साथ आए हुए सारे जन वापस लौट गए। वे बेहोश अवस्था मे जमीन पर गिरी हुई थी। कुछ समय मे प्राण जानेवाला था। इतने मे नाथ महाराज(नवनाथ) ने एक मानव रूप धारण किया और उनके मुंह में अमृत तीर्थ डाल दिया और उन्हें उठाकर बिठा दिया। और उन्हें ९ वर्षो के लिए गाणगापूर जाने को कहा। फिर वे वापस वडगाँव लौट आई। उस समय, उनकी छोटी बहन दगडाबाई की हालंहि मे आठ-दस दिन पहले शादी हुई थी। लेकिन उन्हें कोई बुलावा भेजा नहीं गया था। जब उन्होंने एक-दूसरे को देखा तो उनका दिल भर आया और उन्होने एक दुसरे को जोर से गले लगा लिया। उसी क्षण दगडाबाई पर शक्ति पात हुआ और आगे चलकर उनपर भी आध्यात्मिक कृपा होकर उनके द्वारा अध्यात्मिक संदेशो का आना शुरू हुआ।
अब माताजी का गाणगापूर मे आना जाना शुरू हुआ। उनके साथ गाँव के आठ-दस स्त्री-पुरुष होते। कुछ बार उन्होने पैदल यात्राए की। गाणगापूर मे साक्षात दत्त भगवान उन्हे भेट देते। इस कारणवश उनका वहा से निकलने का मन नही करता। वे दत्त भगवान के पास जिद्ध पकड के बैठं जाती। तब दत्त भगवान समझा बुझा कर उन्हे घर भेज देते। कही बार अधिष्ठान रूप से वे माताजी के साथ रहते और आगे चलकर मैं तुमसे सगुण रूप मे मिलूंगा ऐसा वचन देते। तब जाकर कही वे शांत हो जाती। माताजी को छह महीने तक बिलकुल भी खाना खाया नही जा रहा था। फिर भी हर दिन उनके शौच से मालमलीच्छ बाहर गिरता। एक-दो महीने तक उनके रोम रोम से पू(सेप्टिक) बाहर आता। उनके शरीर का केवल हड्डीयो का ढाचा नजर आ रहा था। उनकी यह सारी पीडा मतलब कुंडलिनी जागरूत होने की अवस्था का समय था। आगे चलकर श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान से मिलने के बाद उनको इस बात का खुलासा हुआ। एक बार गाणगापुरा मे एक भगत के आँग में आया और वह माताजी पर चिल्लाने लगा। तब माताजी को भी अंतस्फुर्ती आई और वे आपस मे विभिन्न भाषाओं मे एक दुसरे से प्रश्न-उत्तर पूछने लगे। अंत में, वह भगत पुजारी माताजी को शरण आया और उसने माताजी से माफी मांगी। माताजी मे कोई अलौकिक शक्ती होने का उसे एहसास हुआ।
इसी तरह एक बार माताजी को हाजी मलंग जाने की इच्छा हुई। वे उनके पिता श्री. चंद्रभान मिस्त्री के साथ वहां गई। मूसलाधार बारिश में वे पूरी तरह भीग गई थी। साथ लाए भोजन की थैली बंदर भगा ले गए थे। श्री. चन्द्रभान मिस्त्री ने एक सज्जन से अनुरोध करके ठहरने के लिए थोडी जगह मांगी थी। थोडी देर वहा आराम करके वे मूल स्थान पर जाने के लिए निकले। उस स्थान पर महिलाओं को जाने की अनुमती नही थी। फिर भी  माताजी को अंतस्फुर्ती आई और वे नाचती हुई दर्गा पर गई और अदृश्य रूप से दर्शन लेकरं उसे प्रदक्षिणा करके वापस आई। वहा के  पुजारी और मुजावर आश्चर्यचकित होकर यह सब देखते रह गए क्योंकि आज तक ऐसी हिम्मत किसी भी महिला ने कभी नहीं की थी। हालाँकि, श्री. चंद्रभान मिस्त्री डर के मारे कांप रहे थे। उन्हें डर था की अब माताजी का वहा के लोगो से बेवजह विवाद होगा और वे लोग उन्हे वहा से निकाल देंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ इस बात से वे भी हैरान थे।


श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान सद्गुरूसे भेट

वर्ष १९८३ में, माताजी वडगाँव लांडगा मे भक्त तान्हुबाई लांडगे इन्होने दिए हुए घर में उदास होकर बैठी थी। वे काफी बैचैन मेहसूस कर रही थी। किसी भी काम मे उनका मन नही लग रहा था। तब उन्होने वहां मौजूद भक्त श्री. संपत से कहा, “अरे संपत, मुझे पढ़ने के लिए कुछ किताब है तो दो?” भाग्यवष उसी समय हालंहि मे श्री. संपत श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान का चरित्र पुस्तक लेकर आए थे। वह चरित्र पुस्तक पढ़ने को देते ही उसमे से श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान की तसवीर ने माताजी से साक्षात बात करना शुरू कर दिया और “तुम्हारा दत्त भगवान मे यही प्रकट हू, मुझसे मिलने आओ” ऐसा कहने लगी। किसी तरह माताजी ने वह रात बिताई। अगले दिन, अपने यजमान(पती) के साथ वे संगमनेर के पास नगर रोड पर ज्ञानमाता स्कूल के सामने के श्री. कलंकी अवतार ईश्वर वैजनाथ भगवान के आश्रम में आ पहुंची। कलंकी वैजनाथ भगवान से नजर मिलते ही दोनो ने एक दुसरो को पहचान लिया। वैजनाथ भगवान ने उन्हें पास बुलाया, उनके मुंह और पीठ से हाथ फेरा और तुरंत उन्हें नामस्मरण दिया। बाद में, महाशिवरात्रि के दिन, उन्होंने माताजी पर शक्तिपात किया और उन्हें कुछ दिनों के लिए आश्रम में रखा। तब से, उनकी सारी बिमारी, पीड़ा धीरे-धीरे कम होने लगी। वे लक्ष्मी का स्वरूप होने की जानकारी श्री कलंकी वैजनाथ भगवान ने उनके यजमान नाना को दी और पूर्व जन्म मे आप शिवभक्त थे तब आपने पार्वती की आराधना करके उसको पाने की कामना की थी। उसके फल स्वरूप भासमान रूप मे वे आपके साथ रही और अब वे आपकी ऋणमुक्त हो चुकी हैं। और अब आप इस लक्ष्मी शिवस्वरूप की अच्छी तरह देखभाल करना ऐसा आदेश उन्हे दिया। तब से अन्य भक्तों की तरह, श्री. नाना भी माताजी का सम्मान करने लगे। कलंकी वैजनाथ भगवान से भेट के बाद उन्होने उनका नाम बेबीनाथ माया रखा दिया। वहा आश्रम मे कलंकी वैजनाथ भगवान के साथ साथ माताजी की भी आरती होती थी। समाज के दुष्ट अज्ञानी लोगो को इस ब्रह्ममाया स्वरूप की जानकारी ना होने के कारण वे आलोचना और निंदा करते। इसलिए, बेबीनाथ माया ने श्री. कलंकी वैजनाथ भगवान से बिनति करके स्वयं: की आरती रोक दी और उन्होने आश्रम में वडगाँव लांडगा से आ-जाकर रहना शुरू कर दिया। उस समय उन्हें विभिन्न भाषाओं में अध्यात्मिक संदेश आते। उसमे वे नाथकालीन बरबर भाषा, अरबी, मराठी, हिंदी आदि भाषाओ मे बात करती। भक्तजन उनके संदेश शांती से सुनते और कृतार्थ हो जाते।